Thursday, 16 May 2013

दिल्ली प्रेस प्रत्यायन उप समिति की बैठक: पत्रकारों को लिया हाशिये पर

आज पुराना सचिवालय स्थित प्रैस रूम में दिल्ली प्रेस प्रत्यायन उप समिति की बैठक हुई। जिसमें अधिकांश उन पत्रकारों को निशाना बनाया गया जिन्होंने गत दिनों प्रेस प्रत्यायन समिति और दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय के विरुद्ध आरटीआई के तहत सूचना मांगी थी। इन पत्रकारों के आड़ में कई अन्य लोगों को भी हाशिये पर लिया गया। काबिलेगौर बात तो यह है कि 28 दिसम्बर 2012 को दिल्ली प्रेस प्रत्यायन समिति की बैठक बुलाई गई थी। जिसमें 73 नए प्रत्यायन कार्ड के लिए चर्चा की गई तथा 46 अस्थाई प्रत्यायन कार्डधारियों को स्थाई प्रत्यायन कार्ड जारी करने के सन्दर्भ में चर्चा हुई। 12 पुराने मामलों तथा 13 ऐसे प्रत्यायनधारी थे जिनके आवेदन संस्थान परिवर्तन के चलते पुन: किए गए थे। सभी मामलों को 11 सदस्यीय उप समिति को दस्तावेजों की जांच करने और फिर उनकी अनुशंसा के लिए सौंपे गए थे। समिति ने 10 जनवरी को बैठक कर सभी मामलों की जांच की और फिर सुझाव दिया कि सभी प्रेस प्रत्यायन कार्डधारियों से एक वर्ष की समाचार पत्रों की प्रतियां मंगाई जाए ताकि उनकी नियमितता परखी जा सके। समिति ने सूचना एवं प्रचार निदेशालय के उपनिदेशक/उपसमिति के सचिव को निर्देश दिया गया कि जिन लोगों के एक वर्ष के समाचार पत्र जमा हो जाएं उन लोगों को प्रेस प्रत्यायन कार्ड जारी कर दिए जाएं। लेकिन उप समिति की सिफारिशों को दिल्ली प्रेस प्रत्यायन समिति ने नजरअंदाज कर पुन: डीआईपी के माध्यम से तलब किया। इस बार डीआईपी के एक अधिकारी ने कुछ लोगों से सांठ-गांठ कर नये मामलों को पहले चर्चा के लिए रखवाये तथा अस्थाई प्रेस प्रत्यायन कार्डधारियों के मामलों को बाद में चर्चा के लिए रखवाया गया। लेकिन शुरूआत में ही डीआईपी के अधिकारियों को साठंगांठ की कलई उस समय खुल गई जब एक समाचार पत्र ने प्रत्यायन के लिए आवेदन दैनिक समाचार पत्र की ओर से किया था लेकिन उसने समाचार पत्र की प्रतियां साप्ताहिक समाचार पत्र की जमा की हुई थी। फल स्वरूप बड़े समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों ने छोटे एवं मझौले समाचार पत्रों को हाशिये पर लिया विशेषकर उन लोगों को जिन्होंने दिल्ली प्रेस प्रत्यायन समिति के सदस्य एवं चेयरमैन के द्वारा मेडिकल बिलों के भुगतान तथा प्रेस प्रत्यायन समिति में गैर प्रत्यायित सदस्यों को लेकर आरटीआई के तहत जानकारी मांगी। हैरानी की बात तो यह है कि जब पुलिस वैरीफिकेशन के बाद अस्थाई प्रेस प्रत्यायन कार्ड जारी किया जाता है तो फिर एक व्यक्ति विशेष के विरुद्ध ही उपसमिति ने पुन: पुलिस वैरीफिकेशन तथा शेष मामलों में सभी से उनके नाम के साथ प्रकाशित समाचारों की क्लिपिंग मांगी गई है। यदि यही क्लीपिंग चाहिए थी तो 4 मार्च 2013 को उपनिदेशक (प्रेस) ने  10 जनवरी 2013 का हवाला देते हुए 45 अंक तत्काल प्रभाव से जमा कराने के आदेश क्यों दिए। उसमें एक वर्ष की न्यूनतम 12 बाईलाइन क्लिीपिंग जमा करने के निर्देश क्यों नहीं दिए गए। इससे स्पष्टï होता है कि दिल्ली प्रेस प्रत्यायन समिति के लोग नियमों के मुताबिक कार्य न करके अपनी निजी दुश्मनी निभाने में लगे हुए है। इसी आड़ में सूचना एवं प्रचार निदेशालय के अधिकारी उन पत्रकारों को भी निबटाने में लगे हुए है जिन लोगों ने आरटीआई के माध्यम से उन अधिकारियों की कारगुजारियों का पर्दाफाश किया था या कर रहे हैं।