Friday, 2 December 2011

गृह मंत्रालय के दखल के बाद ही स्पेशल सेल ने किया था कथित आंतकियों का खुलासा


गृह मंत्रालय के दखल के बाद ही स्पेशल सेल ने किया था कथित आंतकियों का खुलासा
मो.अनस सिद्दीक़ी
दिल्ली पुलिस में एक जमाने तक ढीला पड़ चुका स्पेशल सेल पिछले कुछ दिनों में ही सक्रिय हुआ। इसका कारण गृह मंत्रालय का हस्तक्षेप बताया जाता है। हांलाकि अभी तक दिल्ली पुलिस में तेज तर्रार अफसरों में पूर्व एसीपी लक्ष्मी नारायण राव, राजबीर सिंह और आईपीएस अधिकारी करनैल सिंह का ही नाम चर्चित था। इनमें से एसीपी राजबीर सिंह की हत्या हो चुकी है। लक्ष्मी नारायण राव की पदोन्नति हो चुकी है तथा करनैल सिंह भी पदोन्नत हो चुके हैं। जिसकी वजह से स्पेशल सेल में तेज तर्रार मुखबिरों के गिरोह ने भी किनारा करना शुरू कर दिया था। बताया जाता है कि इन मुखबिरों को पुलिस के कई अधिकारी काम लेने के बाद भुगतान नहीं कर रहे थे। अर्थात एक तरह से स्पेशल सेल मूर्छित अवस्था में आ गया था।
काबिलेगौर है कि आठ सितम्बर को गृह मंत्रालय के दखल के बाद एसीपी संजीव कुमार यादव को स्पेशल सेल में वापस बुलाया गया था। गृह मंत्रालय ने हाईकोर्ट बम ब्लास्ट करने वाले आतंकवादियों का सुराग नहीं लगने से हाथ पांव फूलने के बाद अब तमाम शिथिल पडी एजेंसियों को सक्रिय करने का निर्णय लिया था। जिसकी मदद से आतंकवादियों की तलाश का काम तेज किया जा सके। हांलाकि गृह मंत्रालय ने आतंकवादियों के सफाये के लिए एनआईए नामक स्वायत्त संस्था का भी गठन किया और उसमें सैकड़ों लोगों की फोज को भर दिया गया। लेकिन एनआईए के अधिकारी स्वयं भी अपने आपको सुरक्षित नहीं महसूस करते हैं तो फिर वह दिल्लीवासियों को कैसे सुरक्षित कर पाऐंगे इसमें संदेह है। अपने गठन के तीन वर्ष के बाद भी एनआईए आज तक किसी भी मामले का खुलासा नहीं कर सका है।
दिल्ली में आंतकवादी ऑपरेशन में माहिर एसीपी संजीव कुमार यादव को राजनीतिक दबाव के तहत स्पेशल सेल को शिथिल करने के क्रम में स्पेशल सेल से हटाकर दिल्ली पुलिस की सुरक्षा शाखा में तैनात कर दिया गया था। तकरीबन डेढ़ साल के बाद उनको वापस स्पेशल सेल के आंतकवाद निरोधक अभियान में तैनाती की गई है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल केंद्रीय गृह मंत्रालय और आईबी के परस्पर सहयोग से काम करती है।
संजीव कुमार यादव को लाने के साथ ही स्पेशल सेल के जाबांज अफसर एलएन राव को फिर आतंकवाद निरोधक गतिविधियों में लगाने की सुगबुगाहट है। बदले निजाम में तरक्की देकर एलएन. राव को एडिशनल डीसीपी तो बना दिया गया पर उनकी विशेषज्ञता वाली आतंकवाद निरोधक गतिविधियों से हटाकर स्पेशल सेल के ही प्रशासनिक काम में लगा रखा है।
सूत्रों के अनुसार एलएन. राव के अलावा डीसीपी आलोक कुमार को स्पेशल सेल में दोबारा लाने पर भी गंभीरता से विचार हो रहा है। तीन साल पहले तक स्पेशल सेल को आतंकवादियों के जी का जंजाल बना देने वाले अफसर आलोक कुमार फिलहाल अरूणांचल प्रदेश के एक जिला के एसएसपी के तौर पर काम कर रहे हैं। आलोक कुमार को आतंकवाद निरोधी अभियान में लगी टीम के बीच बेहतर सामन्जस्य के साथ काम करने के लिए जाना जाता है। आलोक कुमार के साथ 1996-97 से दिल्ली को आतंकवादियों से महफूज रखने में लगे वरिष्ठ अधिकारी करनैल सिंह को दिल्ली लाने की चर्चा है। करनैल सिंह फिलहाल मिजोरम के एडीजी हैं।
दिल्ली पुलिस के हलके में चर्चा है कि बटला हाउस इन्काउटर के साथ घिनौनी राजनीति का सिलसिला तेज हो गया था। पुलिस मुठभेड़ में इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा को उनके प्रतिद्वंदी ने निबटा दिया था। जिसको लेकर कई मुसलिम संगठनों ने आवाज उठाई थी कि बटला हाउस में हुई मुठभेड़ में मारे गए किसी भ्ज्ञी आरोपी की गोली से इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा की मौत नहीं हुई है बल्कि उनको प्रतिस्पद्र्धा के चलते विरोधी ने निबटाया है। मामले को तूल पकड़ता देख दिल्ली पुलिस ने राजनीतिक दबाव में आकर आतंकवाद के सफाए में लगे विशेषज्ञ अफसरों की इस टीम को तितर बितर करने का सिलसिला शुरू दिया गया था। आतंकवादियों के बढ़तेे हौसले को खत्म करने के लिए सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। इसके लिए दिल्ली पुलिस में तैनात आतंकवाद के विशेषज्ञ अफसरों को टटोला जा रहा है। तिहाड जेल के डीजी नीरज कुमार और अशोक चांद जैसे अफसरों पर भी गृह मंत्रालय में चर्चा हो रही है।

जर्मन बेकरी ब्लास्ट मे कितने हैं मास्टर माइंड!


जर्मन बेकरी ब्लास्ट मे कितने हैं मास्टर माइंड!
- गत वर्ष अक्टूबर में महाराष्टï्र एटीएस ने किया था खुलासा
- एक वर्ष के बाद दिल्ली ने भी किया पुन: खुलासा, घटना एक मास्टर मांइड अनेक
मो.अनस सिद्दीक़ी
दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के तीन दर्जन से अधिक जांबाज बहादुरों ने दो दिन पूर्व जिस नाटकीय अंदाज में एक नहीं बल्कि तीन-तीन आंतकी हमलों का खुलासा किया है। उसे देखकर तो कोई भी सकते में आ सकता है। पकड़े गए कथित छह आंतकियों के पास से पुलिस ने भारी मात्रा में विस्फोटक पदार्थ और दो एके47 रायफल मय जिंदा कारतूसों के जो पकड़ा था। यदि वास्तव में बरामद चीजों का खुदा न ख्वास्ता इस्तेमाल हो गया होता तो न जाने कितना जानमाल का नुकसान हो गया होता। लेकिन सच्चाई कोसों दूर है दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के अधिकारियों के अधिकारिक बयानों और कथित इस खुलासे से। यह बात हम नहीं कह रहे हैं बल्कि बिहार पुलिस और महाराष्टï्र सरकार के एटीएस के आला अधिकारी कह रहे हैं।
गृहमंत्रालय ने दिल्ली पुलिस के जिन अफसरों की फौज को आंतक के सफाये के लिए एकत्रित किया, उनमें से कई पुलिस अधिकारियों को राष्टï्रपति पुलिस मेडल तक से नवाजा जा चुके हैं। अब वह पुलिस अधिकारी वाह-वाही पाने के लिए किसी बेकसूर को बलि का बकरा बनाए और उसमें एक जिम्मेदार केन्द्रीय गृहमंत्री हां में हां मिलाए तो उस मामले का ऊपर वाला ही मालिक है।
सूत्रों के अनुसार दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के जांबाज और राष्टï्रपति पुलिस मेडल से नवाजे जा चुके एसीपी संजीव कुमार यादव और उनकी टीम ने जिन इंडियन मुजाहिदीन के सदस्यों को गिरफ्तार करने का दावा किया है उनमें मो. अली उर्फ अजमल उर्फ शोएब निवासी करांची पाकिस्तान, मो कतील सिद्दीकी उर्फ साजन, उर्फ सज्जन, उर्फ जावेद, उर्फ शहजादा सलीम निवासी दरभंगा, बिहार, हाल निवासी दिल्ली, मो. इरशाद खान, निवासी समस्तीपुर, बिहार हाल निवासी दिल्ली, गौहर अजीज खुमानी निवासी दरभंगा, बिहार, हाल निवासी दिल्ली, गयूर अहमद जमाली निवासी मधुबनी, बिहार, तथा अब्दुर रहमान निवासी दरभंगा, बिहार हाल निवासी चैन्नई है।
दरभंगा, बिहार जोन के आईजी आरके मिश्रा और दरभंगा जोन के डीआईजी सुधांशु कुमार गयूर जमाली निवासी दरबार मोहल्ला थाना सकरी, मधुबनी, बिहार तथा मो. अजमल निवासी मधुबनी, बिहार के बारे में पहले ही सफाई दे चुके हैं। बिहार के इन दोनों अधिकारियों के मुताबिक फर्र्जी पासपोर्ट के मामले में पूछताछ के लिए कहकर दिल्ली पुलिस ने मदद मांगी थी। लेकिन दिल्ली पुलिस ने इनको आंतकी बताकर बुक कर दिया। जबकि गयूर दरभंगा के एक मदरसे में पढ़ता है और उसके पिता होम्योपैथी के डॉक्टर है। लेकिन दिल्ली पुलिस इन दोनों युवकों को इंडियन मुजाहिदीन का सदस्य बताकर साबित करने की कोशिश की है कि बिहार में भी आंतकवादियों का गढ़ है। जबकि बिहार पुलिस ने दिल्ली पुलिस की मदद की थी। वहीं बिहार के गृह सचिव आमिर सुभानी का कहना है कि दोनों युवकों के विरुद्ध मधुबनी जिले में एक भी मामला पंजीकृत नहीं है। उन्हें हैरानी है कि दिल्ली पुलिस ने किस तरह अपने स्वार्थ की खातिर उन्हें फंसा दिया।
जर्मन बेकरी धमाके के बारे में महाराष्टï्र एटीएस ने 2 अक्टूबर 2010 को एक संवाददाता सम्मेलन में खुलासा कर दो आरोपियों को गिरफ्तार करने का दावा कर चुकी है। महाराष्टï्र एटीस के मुखिया राकेश मारिया ने दावा किया था कि उनकी टीम ने दो युवकों को गिरफ्तार किया है जिनके पास से दो किलो आरडीएक्स(विस्फोटक पदार्थ), पेन ड्राइव, यूएस एवं भारतीय मुद्रा आदि बरामद करने का दावा किया गया था। पकड़े गए आरोपियों को पाक प्रायोजित आंतकी संगठन लश्कर ए तौयबा का सक्रिय सदस्य और जर्मन बकरी बम धमाके का मास्टर मांइड हिमायत बैग को बताया गया था। हिमायत बैग को ओरंगाबाद से गिरफ्तार किया गया था और   उसके दूसरे साथी बिलाल को नासिक से गिरफ्तार करने का दावा किया गयाा था। बताया गया था कि जर्मन बेकरी धमाके की योजना लातूर जिले के उदगीर के एक साइबर कैफे में बनाई गई थी। जिसमें हिमायत बैग की मोहम्मद अहमद जरार सिद्दी बापा और यासीन के साथ तीन फरवरी 2010 को एक मीटिंग उदगीर के ग्लोबल इंटरनेशनल कैफे में हुई थी। महाराष्टï्र एटीएस के मुखिया के अनुसार 7 फरवरी 2010 को हिमायत बैग और यासीन ने उदगीर स्थित साइबर कैफे में विस्फोटक पदार्थ दिया था। जिसका 13 फरवरी 2010 को जर्मन बेकरी धमाके में इस्तेमाल किया गया था। बताया गया था कि इन लोगों की कई अन्य स्थानों पर भी धमाके करने की योजना थी। महाराष्टï्र सरकार ने जर्मन बेकरी धमाके का मास्टर मांइड हिमायत बैग को बताया था और उसके अन्य दो साथी यासीन और मोहसिन को फरार बताया था। अब ऐसे में सवाल उठता है कि एक घटना में कितने मास्टर मांइड है। एक ही घटना का कितने बार खुलासा होगा। वहीं हास्यापद स्थित यह है कि केन्द्रीय गृहमंत्री तथ्यों को नजरअंदाज कर दिल्ली पुलिस के इस फर्जी खुलासे की खुले दिल से हिमायत करते हुए बयान देते हैं। वह भूल जाते है कि इसी देश की अन्य एजेंसी पहले ही खुलासा कर चुकी है।
अवाम ए  हिंद पहले ही लिख चुका है कि दिल्ली पुलिस बुनियादी तौर पर जामा मस्जिद फायरिंग केस में घोषित तीस लाख रूपये के इनाम के फेर और पुन: राष्टï्रपति एवार्ड का खेल है। यही वजह है कि दिल्ली पुलिस ने आनन-फानन में कथित इंडियन मुजाहिदीन के सक्रिय सदस्य यासीन भटकल उर्फ इमरान के बारे में सुराग देने वाले को 15 लाख रूपये बतौर इनाम देने की घोषणा दिल्ली पुलिस मुखिया ने कर डाली। यानी कि दिल्ली पुलिस का मकसद किसी ब धमाके का खुलासा करना नहीं था कि बल्कि उन नामचीन हादसों की आड़ में जामा मस्जिद फायरिंग मामले में घोषित इनाम को हथियाना है!

Sunday, 20 November 2011

डीआईपी में जारी लूट का खेल


डीआईपी निदेशक  रीता कुमार के संरक्षण में डीआईपी में जारी लूट का खेल
          दिल्ली सरकार के सूचना एवम् प्रचार निदेशालय में विज्ञापन एजेंसियों के  सूचीबद्धता के  नाम पर खुलेआम लूट का खेल जारी है। समाचार पत्रों में छपी खबरों के बाद  भ्रष्ट अधिकारी मनी भूषण मल्होत्रा को  आखिरकार डीआईपी से जाना पड़ा। जिसके  बाद विभाग में अकेली पड़ी निदेशक  साहिबा को विभाग के  अधिकारियों की सुध आई, जो इस लुट में शामिल न किए जाने से खासे नाराज़ थे। मामला बिगड़ते देख आई.ए.एस. निदेशक  रीता  कुमार ने अभी तक कनारे किये  हुए विभाग के अधिकारियों से भी सलाह-मशविरा करना शुरू कर दिया है। अब इन अधिकारियों की भी बांछे खिल गई है, अभी तक  निदेशक  को  पानी पी-पी कर कोसने वाले यह अधिकारी बड़े गोलमाल की फिराक मे  हैं।
          सूत्रों के  मुताबिक  निदेशक  रीता कुमार कुछ ऐसी विज्ञापन ऐजेंसियों को सूचीबद्ध करने के लिए जिद्द पर अड़ी हुई है जो टेण्डर के मुताबिक  मानदंडों पर खरी नहीं उतरती हैं। इसलिए यह पूरा प्रकरण विभाग में चर्चा का  विषय बना हुआ है। बताया तो यहां तक जा रहा है कि अपनी चहेती ऐजेंसियों को  सूचीबद्ध करने के लिए सुविधानुसार दस्तावेज तैयार कराए जा रहे हैं। गौरतलब है कि ग्रेड 1 ऐजेंसियां ही दिल्ली सरकार  के  विज्ञापन जारी करती हैं जिससे इन एजेंसियों को भारी कमाई होती है। इसी कमाई को देखते हुए कुछ ऐजेंसियां  ग्रेड 1 में शामिल होने के लिए तरह-तरह के  जुगाड़ लगा रही हैं ओर मोटा चढ़ावा चढ़ाने को  तत्पर हैं। इसी मोटे चढ़ावे को लपकने के लिए विभाग में आपस में छींटाकशी और आर.टी.आई. युद्ध चला हुआ है।
          विभाग में नए आए उपनिदेशक  विकास गोयल इस पुरे प्रकरण में मूकदर्शक  बने हुए हैं और माल के  लिए मची इस जंग से हैरान-परेशान हैं। बताया जा रहा है कि उन्होंने विभाग के भ्रष्टाचार को देखते हुए विज्ञापन शाखा का काम देखने से इनकार कर दिया  था और विज्ञापन एजेंसियों की सूचीबद्धता के गड़बड़-झाले से भी दूर रहने की  इच्छा जाहिर की  है। 
          हास्यस्पद पहलु यह है कि निदेशक  रीता कुमार भारत सरकार के सूचना एवम् प्रसारण मंत्रालय की  निष्पक्ष एवम् स्वतंत्रा विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी द्वारा सूचीबद्ध समाचार पत्रों को  ही नकली बताने पर तुली हुई है जोकि  इन की लघु एवम् मझौले समाचार पत्रों के बारे में अज्ञानता की पराकाष्ठा है। गौरतलब है कि डीएवीपी से सूचीबद्ध समाचार पत्रों को पूरे भारतवर्ष की राज्य सरकारें विज्ञापन जारी करती हैं। डीएवीपी में समाचार पत्र  को सूचीबद्ध करते समय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा बनाई गई विज्ञापन नीति का पालन किया जाता है तथा आवश्यक  30-35 अनिवार्य पात्रता की  शर्तों पर उचित पाये जाने पर ही सूचीबद्ध किया जाता है।
          लघु एवम् मझौले समाचार पत्र स्थानीय समस्याओं को उजागर करने में अग्रणी भुमिका निभाते हैं और एयरकडीशन कल्चर की आई.ए.एस. रीता कुमार जैसे अधिकारियों को जगाने का काम करते हैं। निदेशक  रीता कुमार के पास दिल्ली से प्रकाशित होने वाले डीएवीपी से सूचीबद्ध लगभग 600 लघु एवम् मझौले समाचार पत्रों की  समस्याएं सुनने का समय नहीं है। मगर विज्ञापन एजेंसियोंको सूचीबद्ध करने के लिए वह जिस प्रकार तत्परता दिखा रही है और चहेते अधिकारियों द्वारा जो सौदेबाजी का  खेल चल रहा है वह जांच का  विषय है

Monday, 7 November 2011

शहीदों ओर महापुरूषों के विज्ञापन को फिजुलखर्ची बताती है निदेशक

मामला दिल्ली सरकार के सूचना एवम् प्रचार निदेशालय का
डीआईपी में घोटालो की सरंक्षक रीता कुमार
दिल्ली सरकार के सूचना एवम् प्रचार निदेशालय में आजकल घपले-घोटालों की बयार आई हुई है। विज्ञापन एजेंसियों की सुचीबद्धता के कार्य में एक ऐसे व्यक्ति को सर्वेसर्वा बनाया हुआ है। जिसका तबादला कई महीनों पहले ही निदेशालय से हो चुका है। मगर रीता कुमार के सरंक्षण के चलते यह व्यक्ति मनी भुषण मल्होत्रा यहां पर जमा हुआ है। करोड़ो के इस गोल-माल के खेल में मनी भुषण मल्होत्रा को निदेशक रीता कुमार का विश्वस्त बताया जा रहा है। विज्ञापन ऐजेंसियों के प्रतिनिधियों एवम् प्रबंधकों को मनी भुषण मल्होत्रा एस.डी.एम. पहाड़गंज आॅफिस बुलाकर टटोल रहा है और उन्हें इशारा किया जा रहा है कि आप निदेशक के लिए क्या कर सकते हैं। मामला सिर्फ मेरा नहीं है अब अखबारों में खबर छप जाने से  मामला उपर तक पहुंच गया है। बताया तो यंहा तक जा रहा है कि इस पुरे प्रकरण में ईमानदार प्रेस सचिव तक का नाम घसीटा जा रहा है।
दिल्ली सरकार के अधिकतर विज्ञापन ग्रेड १ एजेंसियां ही जारी करती हैंै। ग्रेड १  में आने के लिए विज्ञापन ऐजेंसियां सुचना एवम् प्रचार निदेशालय में मोटा चढ़ावा चढ़ाती हैं। इसी चढ़ावे के ही मल्होत्रा को तबादले के पश्चात् भी रिलिव नहीं किया जा रहा है। विज्ञापन एजंेसियों की सुचीबद्धता के कार्य में निदेशालय के वरिष्ठ अधिकारियों को किनारे किया हुआ है। जबकि इन्हें इस कार्य का लम्बा अनुभव है। बताया तो यहां तक जा रहा है कि निदेशालय के अधिकारियों से फाइलों पर बिना सहमति लिए ही हस्ताक्षर कराए जा रहे है। जिससे इस घोटाले में कोई आवाज न उठा सके।
मनी भुषण मल्होत्रा अपनी चहेती एजेसियों को ग्रेड १ में शामिल करने के लिए हर हथकंडा अपनाने की फिराक में हैं और एजेंसियों से उनकी सहुलियत के हिसाब से बैलेंस शीट व अन्य दस्तावेज तैयार कराऐ जा रहे हैं ताकि मोटा चढ़ावा देने वाली एजेंसियों को ग्रेड १ में शामिल कर लाभ पहुचांया जा सके। गौरतलब है कि ग्रेड १ एजेंसियां दिल्ली सरकार के करोडो़ रूपए सालाना के विज्ञापन जारी करती है। जिसमें उन्हें मोटा कमीशन मिलता है इसी मोटे कमीशन के खेल में अधिकारी बराबर के शरीक हैं। जबकि सरकार को इससे करोड़ो रूपए की चपत लग रही है।
सुचना एवम् प्रचार निदेशालय का असली मकसद ही समाचार पत्रों को विज्ञापन जारी करना एवम् पत्राकारों के हितों का ध्यान रखना है। मगर दुख्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रद पहलु यह है कि यहां इन कार्यो को छोड़कर सिर्फ रिश्वत खोरी ओर लुट का बाजार गर्म है। जब से रीता कुमार (प्ण्।ण्ै) और मल्होत्रा की बेहतर टयूनिंग हुई है यंहा के अधिकारी बेबस बकरे की तरह नज़र आ रहे है।
ग्रेड १ में भी दिल्ली सरकार का अधिकतर काम पिछले छः महीने में कुछ चुनिंदा एजेंसियां ही कर रही हैं। भ्रष्टाचार का यह ताजा और जीता-जागता सबुत है।
हरियाणा सरकार के सुचना एवम् जन सम्पर्क विभाग ने इस करोड़ो रूपए की कमीशन खोरी को रोककर च्संवादज् नामक ऐजेंसी स्थापित की है। जिससे १५ प्रतिशत कमीशन जो समाचार पत्रों से काटा जाता है। वह एजेंसियों के जेब में जाने से बच सके। इससे बिचैलिओं को जाने वाले करोड़ों रूपए पर रोक लगी है। जो भ्रष्टाचार का मुख्य कारण है। इस कमीशन के रूपए को बचाकर हरियाणा सरकार लघु एवम् मझौले समाचार पत्रों को अधिक विज्ञापन जारी करती है। जिससे जंहा सरकार की योजनाएं आमजन तक पहुंचती है वही अपने आस्त्तिव की लड़ाई लड़ रहे लघु एवम् मझौले समाचार पत्रा को नई उर्जा मिलती है।
मगर दिल्ली सरकार में इसके उल्ट अपनी चहेती एजेंसियो को मोटे विज्ञापन जारी कर लाभ पहुंचाया जा रहा है और लोकपिर्य मुख्यमंत्राी को भी इस मामले से अनभिन्न रखा जा रहा है स्थिति अब यह हो गई है कि लघु एवम् मझौले समाचार पत्रों के विज्ञापन निदेशक रीता कुमार और मनी भुषण मल्होत्रा ने इस लिए बंद कर दिए कि यह विज्ञापन एजेंसी के द्वारा न देकर निदेशालय द्वारा जारी किये जा रहे थे। जिससे एजेंसियों और भ्रष्ट अधिकारियों को कोई प्राप्ति नहीं हो रही थी।

शहीदों ओर महापुरूषों के विज्ञापन को फिजुलखर्ची बताती है निदेशक
दिल्ली सरकार में पहली बार ऐसा हुआ है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और विश्व में भारतीय पताका को फहराने वाली लोह महिला श्रीमती इंदिरा गांधी जी के शहीदी दिवस के विज्ञापन को केवल पचास समाचार पत्रों में ही छपवाकर खाना पुर्ति कर दी। जो कि राष्ट्र की महान विभूतियों के साथ धोखा है  ओर इन की शहादत का घोर अपमान है। हद तो यहां तक हो गई है कि निदेशक रीता कुमार महापुरूषों के जन्म एवम् शहीदी दिवस के विज्ञापनों को फिजुलखर्ची बताती है। जो कि इनकी दृष्टता को दर्शाता है। यह इन महापुरूषों एवम् नायकों को जनता के दिलों से दुर करने की साजिश है।

Thursday, 3 November 2011

patarkaarita mai hai junun

आप में सच्चाई को उजागर करने का साहस है? तो वॉइस ऑफ पॉालिटिक्स आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।
क्या आप ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण, पुलिस, ग्र्राम प्रधान, एनपीसीएल, हॉस्पीटलों की मनमानी, कॉलेज प्रबंधन तथा स्कॉलरशिप को लेकर किसी समस्या से ग्रस्त है?
यदि आपके पास भी कोई सूचना, जानकारी या आपबीती है तो हमें तुरंत लिखें या मेल करें:-
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Thursday, 25 August 2011

गलगोटियाज यूनीवर्सिटी में यूजीसी टीम ·ा छापा


ग्रेटर नोएडा। अनियमितताओं और ·मियों ·े बावजूद धड़ल्ले से प्रवेश लेना अब गलगोटियाज विश्वविद्यालय ·ो भारी पडऩे वाला है। वॉइस ऑफ पालिटिक्स हिन्दी साप्ताहि· समाचार पत्र एवं एजू·ेशन जंगल पर इस बाबत दी जा चु·ी एक्सक्लुसिव न्यूज ·े बाद यूनिवर्सिटी ग्रांट ·मीशन  (यूजीसी) ने इसे गंभीरता से लिया है। खबर ·ा असर  ·ुछ ऐसा हुआ ·ि  बुधवार 17 अगस्त ·ो यूनिवर्सिटी ग्रांट ·मीशन  (यूजीसी) ·ी टीम ने ग्रेटर नोएडा स्थित गलगोटियाज ·ॉलेज ·ैंपस और यूनीवर्सिटी में छापेमारी ·ी।
सूत्रों से पता चला ·ी यहां फैली अनियमितताओं ·ी जांच ·रने यूजीसी ·ी टीम दल बदल ·े साथ पहुंची। टीम ·े सदस्यों ने प्रबंधन से समस्त ·ागजों और दस्तावेजों ·ो मंगाया और  आज त· बन चु·े विश्वविद्यालय परिसर ·ी इमारत ·ी भी जांच ·ी। जान·ारी ·े मुताबि· टीम ·े सदस्यों ने विवि से संबंधित समस्त ·ागजों ·ी जांच ·रने ·े साथ ही प्रबंधन ·ो ·मियों ·े ·ारण जम·र फट·ार भी लगाई। दोपहर में पहुंची टीम ·े सदस्यों ने शुरु हो रहे विवि ·े नए सत्र और निर्माणाधीन परिसर ·े बाबत तमाम प्रश्न पूछ ·र प्रबंधन ·ो परेशान ·र दिया।
इस बारे में यूनीवर्सिटी प्रशासन ने ·ुछ भी बताने से साफ मना ·र दिया। यूनीवर्सिटी ·ी बिल्डिंग अभी तैयार नहीं और क्लासेज शुरू हो चु·ी। इतना ही नहीं मैनेजमेंट ने अप्रैल में ही शपथ पत्र दे·र ·हा था ·ि 24000 स्क्वायर मीटर में यूनीवर्सिटी तैयार है और प्रयोगशाला में 5 ·रोड़ रूपये ·े इक्विप्मेंट भी लगाये गये हैं। ले·िन ह·ी·त में यह सब है ही नहीं।
गौरतलब है ·ी यहां ·रीब 1300 से ज्यादा छात्रों ·ो प्रवेश दिया जा चु·ा है। जब·ी ह·ी·त यह है ·ि यहां यूनीवर्सिटी सिर्फ ·ागजों पर ही बनी है। आलम यह ·ी यहां एडमिशन लेने वाले छात्रों ·ो गलगोटिया ·ालेज आप इंजीनियरिंग में पढऩे ·े लिये मजबूर ·िया जा रहा है।